सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जातियों के नौकरी कोटे में आगे और उप-वर्गीकरण सम्बन्धी पंजाब सरकार के अधिकार को माना

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केस बड़े बैंच को रैफर

चंडीगढ़, 27 अगस्त: अनुसूचित जाति वर्ग में सबसे कमज़ोर वर्गों के जीवन स्तर को नौकरी कोटे में तरजीही आरक्षण के ज़रिये ऊँचा उठाने के कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार के यत्नों को तब और बल मिला जब सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बैंच ने ऐसे आरक्षण के लिए कानून बनाने के राज्य के अधिकार को माना और फिर विचार के लिए मामला बड़े बैंच को रैफर कर दिया।

इस सम्बन्धी जानकारी देते हुए पंजाब के एडवोकेट जनरल अतुल नन्दा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘पंजाब राज्य बनाम दविन्दर सिंह और अन्य’ केस में अपने फ़ैसले को विचारा और यह माना कि पंजाब सरकार नौकरी कोटे में आगे तरजीही आरक्षण प्रदान करने के लिए अनुसूचित जातियों में वर्गीकरण करने का अधिकार रखती है।

शीर्ष अदालत में ‘पंजाब अनुसूचित जातियों और पिछड़ी श्रेणियों (सेवाओं में आरक्षण) एक्ट, 2006 की धारा 4(5) विचाराधीन था, जो सीधी भर्ती में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित कोटे की 50 प्रतिशत पद पहले बालमीकी और मजबी सिखों को मुहैया करवाती है।

इस कानून को हाईकोर्ट ने ‘ई.वी. चिनैया बनाम आंध्रा प्रदेश सरकार और अन्य’ केस में साल 2005 के सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों के संवैधानिक बैंच के फ़ैसले की रौशनी में ग़ैर संवैधानिक ठहराया था और कहा था कि अनुसूचित जातियों में आगे उप-वर्गीकरण की इजाज़त नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बैंच ने अपने फ़ैसले में माना कि अनुसूचित जातियों में कई ख़ास जातियों के दूसरी जातियों की अपेक्षा काफ़ी पिछड़ेपन सम्बन्धी तथ्यों की रौशनी में राज्य सरकार के पास अनुसूचित जातियों में आगे वर्गीकरण का अधिकार है। बैंच ने आगे कहा कि ई.वी. चिनैया मामले में कोऑर्डीनेट बैंच द्वारा सुनाए गए फ़ैसले को इंद्रा साहनी केस के फ़ैसले की रौशनी में फिर विचारने के लिए बड़े बैंच के पास भेजने की ज़रूरत है।

राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी और 2014 में सुप्रीम कोर्ट के 3 जजों के बैंच ने इस मामले को विचारने के लिए बड़े बैंच को रैफर कर दिया। इस केस में प्रारंभिक प्रश्न यह है कि क्या ई.वी. चिनैया केस में 5 जजों के संवैधानिक बैंच के फ़ैसले को इंद्रा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार और अन्य केस में अदालत के 9 जजों के बैंच द्वारा दिखाए कानून की व्याख्या की रौशनी में फिर विचार करने की ज़रूरत है, जिसमें बहुसंख्यक का मानना था कि पिछड़े वर्गों में आगे अनय पिछड़े हो सकते हैं और राज्य सरकार के पास भारत के संविधान की धारा 16 (4) के अधीन आगे और वर्गीकरण का अधिकार होगा।

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