जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के साथ आज़ादी की लड़ाई को मिली नयी दिशा-पैनलिस्टस

पैनेलिस्टस के मुताबिक

चंडीगढ़, 14 दिसम्बर:जलियांवाला बाग़ हत्याकांड ने भारत की आज़ादी की लड़ाई को नयी दिशा दी और इसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई के नेताओं ने फ़ैसला किया कि वह ब्रिटिश साम्राज्य की और ज्य़ादतियां बर्दाश्त नहीं करेंगे। मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन जलियांवाला बाग़ हत्याकांड सम्बन्धी करवाई गोष्ठी के दौरान इन विचारों का प्रगटावा करते हुए श्री आनन्दपुर साहिब से संसद मैंबर श्री मनीष तिवाड़ी ने इस हत्याकांड सम्बन्धी और खोज किये जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।इस गोष्ठी के दौरान इतिहासकार कीश्वर देसाई ने संचालक की भूमिका निभाई और गोष्ठी में इतिहासकार मनोज जोशी, वाल्टर रीड और गुरू नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर के प्रोफ़ैसर सुखदेव सिंह सोहल ने भी हिस्सा लिया।हत्याकांड सम्बन्धी और खोज और हत्याकांड में मारे गए लोगों की संख्या सम्बन्धी अध्ययन करने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए श्री मनीष तिवाड़ी ने कहा कि उस समय पर ब्रिटिश साम्राज्य की ज्य़ादतियां चरम पर थीं और लोगों की आवाज़ को दबाने के लिए हर प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि जब महात्मा गांधी भारत लौटे तो आज़ादी की लड़ाई देश व्यापक लहर बनी और ब्रिटिश साम्राज्य के लिए पंजाब बहुत संवेदनशील था।श्री तिवाड़ी ने कहा कि जलियांवाला बाग़ हत्याकांड कोई अचानक घटी घटना नहीं थी बल्कि यह ब्रिटिश राज द्वारा किये जा रहे ज़ुल्मों का हिस्सा था। उन्होंने बताया कि इससे पहले कूका लहर के समय 1982 में इस लहर के नेताओं को पंजाब में तोपों के आगे बाँध कर उड़ा देने के साथ शहीद किया गया था। उन्होंने बताया कि माहिरों के मुताबिक बैसाखी वाले दिन हुए जलियांंवाला बाग़ हत्याकांड के दौरान निहत्थे लोगों पर 1500 से अधिक गोलियाँ चलाईं गई थीं।गोष्ठी में हिस्सा लेते हुए प्रो. सुखदेव सिंह सोहल ने इस हत्याकांड के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला, जिनमें उस समय की भारतीय सेना की बनावट, ब्रिगेडियर-जनरल आर. डायर के पद और जि़म्मेदारी शामिल थे। उन्होंने 1857 की घटनाओं संबंधी भी जानकारी सांझा की। उन्होंने बताया कि जनरल डायर और लैफ्टिनैंट गवर्नर सर माइकल ओडवाहर दोनों आयरलैंड से सम्बन्धित थे और दोनों की सोच भी काफ़ी मिलती थी। उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा इस हत्याकांड सम्बन्धी काफ़ी समय बहुत सी जानकारी प्रसारित न होने देने के लिए अपनाए गए तरीकों संबंधी जानकारी देते हुए कहा कि ऐसा होने के कारण बहुत समय इस हत्याकांड संबंधी बहुत कुछ साझा नहीं हो सका।गोष्ठी के दौरान श्री मनोज जोशी ने इस हत्याकांड के बाद महात्मा गांधी द्वारा निभाई गई भूमिका संबंधी भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद भी इस हत्याकांड के अध्ययन सम्बन्धी जितना काम किया जाना चाहिए था, उतना काम नहीं किया गया। पैनेलिस्टस ने बताया कि अमृतसर में उस समय पर विभिन्न हिस्सों में बैन लगाया गया था परन्तु इस सम्बन्धी जलियांवाला बाग़ के नज़दीक अनाऊंसमैंट नहीं की गई थी।कीश्वर देसाई ने कहा कि जलियांवाला बाग़ हत्याकांड हिंसा की क्रूर उदाहरण है जो बताती है किसी बात का शांतमयी ढंग से विरोध करने वालों के मन में दहशत पैदा करने के लिए क्या-क्या किया गया। कीश्वर देसाई ने बताया कि उनकी किताब-जलियांवाला बाग़ 1919 -द रियल स्टोरी, उनको श्रद्धाँजलि है जो इस हत्याकांड में मारे गए।कैप्शन:संसद मैंबर श्री मनीष तिवाड़ी, इतिहासकार कीश्वर देसाई, मनोज जोशी, वाल्टर रीड और गुरू नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर के प्रोफ़ैसर सुखदेव सिंह सोहल, गोष्ठी में हिस्सा लेते हुए।

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