भारतीय सेना के शौर्य,त्याग व बलिदान का प्रतीक है, 1971 के भारत पाक युद्ध की स्वर्णिम जीत-कुंवर विक्की

कहा-पाक जेलों में बंद 54 युद्धबंदी सैनिकों को रिहा करवाने में नाकाम रही सरकारें

पठानकोट 17 दिसंबर (मनन सैनी)।1971 के भारत पाक युद्ध की जीत को समर्पित स्वर्णिम विजय दिवस पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। भारतीय सेना व समूह देशवासियों ने उस युद्ध में शहीद हुए जांबाज सैनिकों के शौर्य को एकसुर में याद किया। इसी कड़ी में शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने स्थानीय टैंक चौंक व ध्रुव पार्क में बने शहीदी स्मारकों पर पुष्पांजलि अर्पित कर 1971 की भारत पाक जंग के शहीदों को नमन किया।

इस मौके पर विशेष तौर पर पहुंचे परिषद के महासचिव कुंवर रविंदर सिंह विक्की ने कहा कि 1971 के भारत पाक युद्ध की स्वर्णिम जीत भारतीय सेना के अद्भुत शौर्य, वीरता, त्याग व बलिदान का प्रतीक है। 49 साल पहले लड़ी इस जंग में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को हर क्षेत्र में शिकस्त दी। आज ही के दिन हमारी इस्र्टन कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष पाकिस्तानी जनरल एएके न्याजी ने अपने 93 हजार सैनिकों के साथ आत्म समर्पण किया था। उस दिन से लेकर हर वर्ष सारा देश भारत पाक युद्ध की जीत के जश्न को आज के दिन विजय दिवस के रुप में मनाते हुए अपने शहीदों को नमन करता है। उन्होंने कहा कि आज के दिन से लेकर अगले पूरे वर्ष तक देशवासी व भारतीय सेना इस युद्ध की जीत के 50 साल पूरे होने पर स्वर्णिम विजय दिवस के रुप में मनाएगा तथा भारतीय सेना दिल्ली में बने युद्ध स्मारक (वॉर मेमोरियल) से एक मशाल यात्रा शुरु करेगी, जो पूरे देश में घूमते हुए पठानकोट में भी पहुंचेेगी।

पाक जेलों में बंद 54 युद्धबंदियों के परिजनों को आज भी है उनके वतन लौटने का इंतजार
कुंवर विक्की ने कहा कि बेशक पूरा देश भारत पाक युद्ध की जीत को अगले पूरे साल स्वर्णिम विजय दिवस के रुप में मनाने जा रहा है। मगर इस उत्सव के पीछे एक गहन अंधेरा है और उस अंधेरे में सिसकियां है, उन 54 युद्धबंदियों के परिजनों की जिन्हें इस युद्ध के 49 वर्षों के बाद भी पाक जेलों में बंद अपनो को वतन लौटने का इंतजार है। उन्होंने कहा कि यह देश का दुर्भागय है कि हमने तो भारतीय सेना के समक्ष आत्म समर्पण करने वाले पाकिस्तानी सेना के 93 हजार सैनिकों को तो शिमला समझौते के तहत उन्हें पाक को वापिस लौटा दिया। मगर पाकिस्तान द्वारा युद्ध में बंदी बनाए अपने 54 सैनिकों को रिहा करवाने में हमारी सरकारें नाकामयाब रही। जिससे उनके परिजनों की भावनाएं आहत हैं। अपनों की रिहाई के लिए यह परिवार सरकारों से गुहार लगाते लगाते थक चुके हैं। जब भी बाघा बार्डर से पाक से भारतीय कैदियों की रिहाई का समाचार इन परिवारों को मिलता है तो यह परिवार अपने युद्धबंदी सैनिकों की तस्वीरें हाथ में लिए बाघा बार्डर पहुंच जाते हैं। लेकिन हर बार उनहें निराशा ही मिलती है। उन्होंने सरकार से अपील करते हुए कहा कि पाक पर दबाव बनाकर अपने इन युद्धबंदियों की रिहाई का रास्ता बहाल कर इनके परिजनों के रिसते जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास करे तथा तभी हम स्वर्णिम विजय दिवस मनाने के हकदार होंगे। इस मौके पर परिषद के प्रैस सचिव बिट्टा काटल, शहीद सिपाही मक्खन सिंह के पिता हंस राज, शहीद सिपाही मोहन सिंह के भाई ठाकुर जीवन सिंह चिब शहीद सिपाही जतिंदर कुमार के पिता राजेश कुमार व सूबेदार शक्ति पठानिया भी उपस्थित थे।

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