किसान आंदोलन-भारत माता असल में है क्या यह समझना जरुरी है !

भारत माता की जय, भारत माता की माता यह नारे हमने बहुत सुने है जो अच्छी बात है, परन्तु क्या हम जानते है कि क्या है भारत माता, कौन है भारत माता? किसकी जीत चाहते है हम? हमें यह समझना बेहद जरुरी है।

भारत माता में सिर्फ धरती, नदियां, पहाड़, जंगल, अनाज देने वाले खेत, पेड़, समंदर तो है ही परन्तु हमारे या आपके बिना यह सब बेमतलब है, सबसे अहम है भारत की सरजमीं पर फैली आवाम, भारत के लोग। अपने करोड़ो बेटे, बेटियों से ही भारत मां की पहचान है, इसलिए हम जीतेंगे तो भारत माता जीतेगी। यहां के लोग खुश होगें, खुशहाल होगें तो मां खुश होगी। मां के लिए सभी बच्चें एक समान होते है, बेशक कोई काला हो या गोरा, कोई बड़ा हो या छोटा। अगर बच्चा रोता बिलखता होगा तो मां को भी कभी आराम नही मिलेगा।

भारत एक कृषि प्रदान देश है, जहां किसान को अन्नदाता कहा जाता है और मजदूर ताकत । परन्तु जहां अन्नदाता और मजदूर ही सड़कों पर हो वह देश कहां जा रहा है इस बात का आप खुद अंदाजा लगा सकते है।हमारी सरकारे किसानों के हकों के प्रति कितनी संवेदनशील है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हे अभी तक अपनी फसलों के लिए एमआरपी की बजाए एमएसपी के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। ओपन मार्किट में बिकने वाले गन्ने का सालों का बकाया अदा करवाने के लिए किसानों ने विरोध दर्ज करवाने हेतू अपना खून तक निकलवाया परन्तु बकाया नही मिलता। परन्तु सरकारों का डंडा हमेशा निजी मिल मालिकों की बजाए किसानों की तरफ धूमा है। इसमें देश के सभी राज्यों की सरकारें शुमार है, जिसमें पंजाब भी शामिल है।

परन्तु आज दिल्ली में जो हो रहा है, जिस तरह किसानों ने दिल्ली को घेर रखा है, जिस तरह नाजुक स्थिती बनी हुई है। उसे हलके में लेना उचित बिलकुल भी नही है। किसानों को हलके में ले रही भाजपा सरकार ने भी आखिरकार किसान आंदोलन को अब संजीदगी से लेना शुरु कर किया है और उम्मीद है कि इसके सार्थक नतीजे निकलेंगे। परन्तु सवाल यह है कि क्यों सरकार ऐसा अडियल रवईया खुद अपनों के खिलाफ ही अख्तियार किया। आखिर साबित क्या करना चाहती है ? क्यों सरकार को यह दिन देखना पड़ा क्या?

गौर रहे कि पहले किसानों के उज्जवल भविष्य के लिए किसान संगठनों, सहयोगियों की सलाह बिना कानून बना दिए जाते है। उन कानूनों को किसानों के फायदे में बताया जाता है परन्तु किसानों को फायदें गिनवाने में सरकार नाकाम होती है। विपक्ष का काम है राजनिति करना परन्तु पुराना गठबंधन (अकाली दल) इत्यादि अपने साथ छोड़ जाते है, परन्तु सरकार नही मानती।किसान संघर्ष करता हुआ पहले सड़को पर आता है, सरकार के कानों पर जूं तक नही रेगंती। किसान रेल रोकता है, सरकार उन्हे आश्वासन में लेकर समझाने की बजाए उनसे हठ भाव करती है। आखिरकार किसान को दिल्ली का रुख करना पड़ता है।

भाजपा की केंद्र सरकार तथा भाजपा शासित राज्य सरकारें का किसानों के प्रति रवईया तथा संवेदनशील का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसानों को रोकने के लिए रेजर वायर लगाई जाती है, 20 फुट गड्डे खोदें जाते है, टीयर गैस छोड़ी जाती है। परन्तु भविष्य को लेकर चिंताग्रस्त किसान सब कुछ पार कर दिल्ली पहुंच ही जाता है। क्यों केंद्र सरकार ने किसान आंदोलन को हलके में लिया।क्या सरकार ने इस भव्य आंदोलन को भी ठीक नोटबंदी, जीएसटी लागू करने या अचानक लाकडाऊन लगाना संबंधी अचानक निर्णय लेकर उसी तराजू में तोलने की कौशिश की और सोचा कि सब जल्द संभल जाएगा। परन्तु इसी में वह भूल कर गई।

और अभी भी सरकार का समर्थन करने वाले पार्टी के लोग इस जनआक्रोश को समझने में भूल कर रहे है।सरकार के प्रति रोष व्यक्त करने वालों को आईटी सैल वालों उन्हे देश विरोधी तत्वों से जोड़ देते है जो सही नही है। परन्तु अब इसी तरह आग में घी डालने का प्रयास पहले किसान को बिचौलिया बता कर किया, फिर खालिस्तानी बता कर किया, जो गैरजिम्मेदाराना है। हमें नही भूलना चाहिए कि पुलिस और सुरक्षालों में भी लोग इन ग्रामीण समूदायों से आते है और ऐसी बेतुके ब्यानों से सभी में असंतोष फैलता है।भारत में बसने वाले हरेक धर्म, हरेक महजब, हरेक वर्ग इस भव्य भारत के समाज का ही हिस्सा है। सभी बड़े व्यापारियों, निवेशियों, छोटे बड़े किसान, मजदूर, दुकानदार, नौकरी करने वाले इत्यादि सभी इस समाज का हिस्सा है। इस बात को समझना जरुरी है।

भारत में हरेक को लोकतंत्र के दायरे में रह कर अपने हक के लिए आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। परन्तु खुद सरकारें तथा उनके समर्थक यह दायरा तय करने की कौशिश करते है, जो सही नही है। खैर अगर केंद्र सरकार को उनके स्थानीय नेता सही जानकारी देते तो आज यह नौबत न आती। आंदोलन में अब पंजाब के साथ साथ हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उत्तारांचल का किसान भी जुडने लगा है। हाई कोर्ट के पूर्ण जज विरोध कर रहे है, गीतकार, बुद्धिजीवी वर्ग विरोध कर रहा है। खिलाड़ी समर्थन में आते हुए सम्मान लौटा रहे है। क्यों क्या भाजपा इन सबके शंके भी दूर करने में असफल साबित हुई।

परन्तु अब जरुरत है कि चल रही बातचीत के जरिए ही इन मसलों का हल निकाल लिया जाए। क्योंकि सरकार लोगो के लिए ही चुनी जाती है। वरना बहुत देर हो जाएगी, दिल में कड़वाहट लेकर हम बेहतर खुशहाल समाज की कामना नही कर सकते। कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि भारत माता तभी खुशहाल है जब तक देश के लोग खुशहाल है।

वैसे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं भाजपा के पहले प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने लिखा था कि जहां विरोध और विरोधियों को गद्दार मानने का भाव है, वहां लोकतंत्र समाप्त होता है और तानाशाही का उदय होता है। परन्तु भारत लोकतांत्रिक देश है न कि तानाशाह मुल्क इसलिए हाथ जोड़ कर निवेदन है किसानों की सरकार सुध लें।

लेखक- मनन सैनी
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